सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

युवा प्रखर-मुखर मिथलेश दुबे- चिट्ठाकार-चर्चा (ललित शर्मा)

नवयुवाओं के विषय में बुजुर्ग लोग हमेशा सोचते हैं कि इनकी बुद्धि अभी परिपक्व नहीं हुयी है. ज्यादा दूर की नहीं सोच सकते. बिना सोचे समझे उल्टा-सीधा करते रहते हैं. जब भी मौका मिलता है तो उनको फटकार दिया जाता है.हमारे साथ भी यही होता था. हम भी जब कभी बुजुर्गों की महफ़िल में बोल उठते थे तो हमें कहा जाता था अरे! ये बात तुम्हारी समझ में आने की नहीं है. बड़ों के बीच में नहीं बोलना चाहिए. नव युवा भी इस समाज को अपने नजरिये से देखते हैं. उनकी व्यक्तिगत सोच होती है चितन  होता है. किसी भी काम को तत्परता से करते है और घनात्मक सोच भी रखते हैं. जिसकी सोच परिपक्व होती है और सही दिशा में सोचता है उसे अबाल वृद्ध कहा गया है. अब मै ललित शर्मा ले चलता हूँ आपको आज की चिट्ठाकार-चर्चा पर
हमारी चर्चा में शामिल आज के नव युवा चिट्ठाकार हैं मिथलेश दुबे जी. इनका अपनी बात कहने का अंदाज ही निराला है. कभी-कभी बहुत ही विचारोत्तेजक विषय चुनते है तथा उस पर सीधा हमला ही बोलते हैं ठांय-ठांय और कभी घर गृहस्थी की सोच मेंपड़ जाते हैं तो जलेबी समोसे को भी लपेटे में ले लेते हैं. इनकी मिसाईल चौतरफा वार करते है. जो इसकी जद में आ गया उसका तो कल्याण ही हो जाता है. इनका ब्लाग दुबे है तथातेताला, लख़नऊ ब्लॉगर एसोसिएशन,हिन्दी साहित्य मंच पर भी इनकी उपस्थिती है.
 ब्लाग प्रोफ़ाईल पर अपने विषय मे कुछ इस तरह लिखते है……….

Mithilesh Dubey

मेरे बारे में

कभी यूं गुमसुम रहना अच्छा लगता है , कभी कोरे पन्नों को सजाना अच्छा लगता है , कभी जब दर्द से दहकता है ये दिल तो , शब्दों में तुझको उकेरना अच्छा लगता है ।। अगर आप मुझसे बात करना चाहें तो संपर्क करें-09891584813
……इनकी पहली पोस्ट….

Saturday, May 16, 2009


Introduction
hi dosto, kise ho aap log mai aap logo ko batana chahta hun kee mai ek naya bloger hun, plese agar mai kuch bhi galat likhu to aap salah de sakto ho.
…अद्यतन पोस्ट.
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Friday, January 29, 2010


शरीर दिखाने वाले कपडे पहनने को आजादी कतई नहीं माना जा सकता----(मिथिलेश दुबे)
आजादी को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। हर इंसान अपनी बुद्धि का सही उपयोग करते हुए आजादी की सीमा तय करता है। हर व्यक्ति स्वतंत्र रहना चाहता है, परंतु इसकी अधिकता कभी-कभी नुकसानदेह साबित होती है। आज बेटी-बेटे को समानता का दर्जा दिया जाता है, लेकिन समाज का माहौल देखते हुए लडकियों की सुरक्षा की दृष्टि से माता-पिता उनकी आजादी की सीमाएं तय कर देते हैं, जो कि किसी दृष्टि से गलत नहीं है। यही बात बेटों पर भी लागू होती हैं। उन्हें भी अनुशासित करने के लिए समय-समय पर उनकी आजादी की सीमाएं तय करना बहुत जरूरी है। आजादी में संतुलन बहुत जरूरी है। मेरे विचार से आजादी का सही अर्थ है-सामंजस्य।
अगर हर इंसान आजादी के साथ अनुशासन का भी महत्व समझे तभी देश सही मायने में आजाद होगा। वर्षो की गुलामी सहने और लाखों देशवासियों का जीवन खोने के बाद हमने यह बहुमूल्य आजादी पाई है। लेकिन आज की युवा पीढी आजादी का वास्तविक अर्थ भूलती जा रही है। पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर वह अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से दूर होती जा रही है। नशाखोरी, मौज-मस्ती करना, धर्म और जाति के नाम पर दंगे करना और राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुंचाना भी आज कुछ लोगों को गलत नहीं लगता। अधिकारों की दुहाई देने वाले क्या कभी अपने कर्तव्यों की भी बात करते हैं? सच तो यह है कि ऐसा करना अमूल्य आजादी का दुरुपयोग है।
आज हमारे देश में चारों ओर भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और आतंक का अंधकार छाया है। ऐसी स्थिति में सभी देशवासियों का कर्तव्य है कि वे एक भयमुक्त, सुव्यवस्थित, सुसंगठित और विकसित समाज की स्थापना में योगदान करें। युवा पीढी आजादी के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे। अपनी आजादी के साथ दूसरों की स्वतंत्रता एवं निजता का भी ध्यान रखे। अनुशासित हो, केवल अपनी मनमर्जी न करे। मेरे विचार से आजादी की एक सीमा रेखा अवश्य होनी चाहिए। इसी में परिवार, समाज और देश का कल्याण संभव है। धर्म और जाति के भेदभाव के बिना सभी नागरिक आजादी के साथ सुकून की सांस ले सकें, आजादी का यही असली मकसद होना चाहिए। आजादी का सीधा अर्थ होता है किसी पर निर्भर न होना, आत्मसम्मान के साथ सर उठा कर जीना। लेकिन आज लोग अपने निजी स्वार्थो के लिए आजादी को मनचाहे ढंग से परिभाषित करते हैं। दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखे बिना हर काम अपनी मनमर्जी से करने, अनुशासन के नियमों को तोडने और पश्चिमी सम्यता का अंधानुकरण करते हुए शरीर दिखाने वाले कपडे पहनने को आजादी कतई नहीं माना जा सकता। बौद्धिक स्तर पर हम कितने आजाद हैं, यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अब देता हुँ चर्चा को विराम-आप सभी को ललित शर्मा का राम

18 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

मिथिलेश ही से यह परिचय भी अच्छा लगा ललित जी ! आभार ! मैं उनके आज की युवा पीढी से सम्बंधित जो भी लेख होते है महत्व देता हूँ और बड़े चाव से पढता हूँ क्योंकि आज की युवा पीढी का जो आतंरिक चित्रण , उसकी खूबिया और खामियां मिथिलेश जैसे युवा ही बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकते है !

जी.के. अवधिया ने कहा…

आपने सही फरमाया कि मिथलेश दुबे जी का अपनी बात कहने का अंदाज ही निराला है।

"नवयुवाओं के विषय में बुजुर्ग लोग हमेशा सोचते हैं कि इनकी बुद्धि अभी परिपक्व नहीं हुयी है"

भैया हमें ऐसे सोच वाले बुजुर्गों में मत शामिल कर लेना, हमारे विचार से तो बुजुर्ग "गुड़" हैं और युवा "शक्कर"!

arvind ने कहा…

mithilesh dubeji se milkar achhaa lagaa.

बी एस पाबला ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

अच्छी चल रही है चिट्ठा अरे नहीं चिट्ठाकार चर्चा :)

Arshad Ali ने कहा…

पी सी गोदियाल साहब से सहमत हूँ

मिथलेश जी दिमाग पर छा जाने की छमता रखते हें

आपका ब्लॉग उत्साह बढाने का माध्यम है

शुक्रिया ....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अच्छा लगा मिथिलेश जी को मिल कर ......... उनकी कलाम की तेज़ धार प्रभाव डाले बिना नही छोड़ती .........

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

मेरी उपरोक्त टिप्पणी में जो टंकण त्रुटियाँ है उसके लिए क्षमा ! " मिथिलेश ही " की जगह मिथिलेश जी पढ़े ! शुक्रिया !

वाणी गीत ने कहा…

मिथिलेश दुबे लिखते तो बहुत अच्छा हैं ...कोई शक नहीं ....!!

rashmi ravija ने कहा…

मिथिलेश से फिर से यूँ मिलकर बहुत अच्छा लगा...उनकी रचनाओं के माध्यम से तो हम उन्हें जानते ही हैं....

Suman ने कहा…

nice

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

वाह मिथिलेश वाह
ठांय ठां ठांठां

दीपक 'मशाल' ने कहा…

ek baar fir Mithilesh ko janna sukhad raha... ye aise ki kalam ki takat aazmate rahen ye dua hai...
badhai bhai..
Jai Hind...

tulsibhai ने कहा…

" mithilesh ..jinko mai sayad karib se janta hu .yuva hai aur samaj ki koi bhi burai unki nazar se bach nahi sakti hai ...aapne bilkul sahi kaha hai ...ki vo apni kalam leker burai o per sidhha hamala hi bol dete hai ."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

'अदा' ने कहा…

मिथिलेश को भला कौन नहीं जानता है ..बहुत प्रखर-मुखर व्यक्तित्व का युवक है..
इसकी प्रविष्ठियां हमेशा ही सार्थक विषयों पर होतीं हैं...सच कहने में नहीं डरता है...
मिथिलेश एक सच्चा दोस्त है..अपने दोस्तों का साथ कैसी भी मुसीबत क्यों न हो ...नहीं छोड़ता है...

मुझे मिथिलेश के रूप में एक बहुत ही अच्छा इंसान और एक प्यारा भाई मिला है...
मिथिलेश ..आई लव यू..!!
हमेशा इसी तरह सच्चाई के साथ लिखते रहो..आगे बढ़ते रहो..
दीदी...

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आनन्ददायी एवं सुखद रहा मिथलेश से मिलना.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

मिथिलेश जी की प्रखरता तो सर्व-व्याप्त है इस चिट्ठाजगत में । इनकी विशेषता इन्हें उल्लेखनीय बनाती है । आभार परिचय के लिये ।

पलक ने कहा…

अनूप ले रहे हैं मौज : फुरसत में रहते हैं हर रोज : ति‍तलियां उड़ाते हैं http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/06/blog-post.html सर आप भी एक पकड़ लीजिए नीशू तिवारी की विशेष फरमाइश पर।