गुरुवार, 21 जनवरी 2010

युवा सोच युवा ख्यालात-कुलवंत हैप्पी-"चिट्ठाकार चर्चा"(ललित शर्मा)

मने किताबों में पढ़ा है फिल्मो में देखा की गुलाम होते थे. बर्बर युग में मानवों की नीलामी होती थी, गुलाम खरीदे बेचे जाते थे. उनका निजी सम्पत्ति की तरह उपयोग होता था. दासता का युग अमानवीय कृत्यों से भरा पड़ा है. खैर वह बर्बर कल था लोग असभ्य हे आज के मायने में. लेकिन आज सभ्य कहे जाने वाले आधुनिक काल में खुले आम मानवों की नीलामी हो रही है. खरीदने वाले का मान हो रहा  है और बिकने वाला भी सम्मानित हो रहा है. मित्रों मै आई पी एल में खिलाडियों की खरीदी बिक्री की बात कर रहा हूँ. मै ललित शर्मा आपको ले चलता हूँ आज के "चिट्ठाकार चर्चा" पर,
आज हम मिलवाते हैं आपको ब्लाग जगत के एक और चिट्ठाकार कुलवंत शर्मा हैप्पी जी से, जो शक्ल-सूरत, बात-चीत, लेखन से एक बेबाक और जिंदादिल इन्सान नजर आते हैं. उनके लेखन में साफ गोई स्पष्ट रूप से नजर आती है. अपनी बात घुमा फिर कर कहने की बजाय सीधे -सपाट तौर पर रखना पसंद करते हैं. ब्लाग जगत में इनका आगमन देखें तो इनकी पहली पोस्ट युवा सोच युवा खयालात पर ३अक्तुबर २००८ को प्रकाशित हुयी है इनके दुसरे ब्लाग खुली खिड़की पर पहली पोस्ट रविवार १५ फरवरी २००९ कि दिखाई पड़ती है. इनका तीसरा ब्लाग ਮੇਰੀ ਜ਼ੁਬਾਨ (मेरी जुबान) पंजाबी भाषा का है जिसमे पहली पोस्ट रविवार 22  मार्च २००९ की दिखाई पड़ती है. इनका फिल्मो का ब्लाग फिल्मी हलचल भी है. अब हम ये देखते हैं कि कुलवंत शर्मा अपने विषय में क्या कहते हैं.

कुलवंत हैप्पी 


मेरे बारे में

मैंने 27 अक्टूबर 1984 को श्री हेमराज शर्मा के घर स्व. श्रीमती कृष्णादेवी की कोख से जन्म लिया। जन्म के वक्त मेरा नाम कुलवंत राय रखा गया, और प्यार का नाम हैप्पी। लेकिन आगे चलकर मैंने दोनों नामों का विलय कर दिया "कुलवंत हैप्पी"। तब हम हरियाणा के छोटे से गाँव दारेआला में रहते थे। इस गांव में मुझे थोड़ी थोड़ी समझ आई। इस गाँव से शहर बठिंडा तक का रास्ता नापा और इस शहर में गुजारे कुछ साल मैंने। शहर से फिर कदम गाँव की ओर चले.लेकिन इस बार गाँव कोई और था. मेरा पुश्तैनी गांव..जहां मेरे दादा परदादा रहा करते थे, जिस गाँव की गलियों खेतों में खेलते हुए मेरे पिता जवान हुए। वो ही गांव जिस गाँव हीरके (मानसा) में मेरी मां दुल्हन बन आई थी। यहां पर मैंने दसवीं कक्षा तक जमकर की पढ़ाई और खेती। इस गांव से फिर पहुंचा, उसी शहर जिसको छोड़ा था, कुछ साल पहले। 27 जुलाई 2000 को दैनिक जागरण के साथ जुड़ा, मगर कमबख्त शहर ने मुझे फिर धक्के मारकर निकाल दिया और मैं पहुंच गया छोटी मुम्बई बोले तो इंदौर। इस यात्रा दौरान दैनिक जागरण, पंजाब केसरी दिल्ली, सीमा संदेश, ताज-ए-बठिंडा हिंदी समाचार पत्रों में काम किया, इसके अलावा सीनियर इंडिया, नैपट्यून पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित हुए और 27 दिसंबर 2006 से वेबदुनिया.कॉम के पंजाबी संस्करण को संवारने में लगा हुआ हूं।

चलते हैं इनके चिट्ठों की यात्रा पर

युवा सोच युवा खयालात

शुक्रवार, ३ अक्तूबर २००८


कैसे निकलूं घर से...

रेलवे स्टेशन की तरफ,
बस स्टैंड की तरफ,
आफिस की तरफ घर से बाहर की तरफ
बढ़ते हुए कदम रुक जाते हैं,
और पलटकर देखता हूं घर को,
अपने आशियाने को,
जिसको खून पसीने की कमाई से बनाया है,
जिसमें आकर मुझे सकून मिलता है,
सोचता हूं,

खुली खिड़की

रविवार, १५ फरवरी २००९


शनिवार को वेलेंटाइनज डे था, हिन्दी में कहें तो प्यार को प्रकट करने का दिन. मुझे पता नहीं आप सब का ये दिन कैसा गुजरा,लेकिन दोस्तों मेरे लिए ये दिन एक यादगार बन गया. रात के दस साढ़े दस बजे होंगे, जब मैं और मेरी पत्नी बहार से खाना खाकर घर लौटे, उसने मजाक करते हुए कहा कि क्या बच्चा चाकलेट खाएगा, मैं भी मूड में था, हां हां क्यों नहीं, बच्चा चाकलेट खाएगा. वो फिर अपनी बात को दोहराते हुए बोली 'क्या बच्चा चाकलेट खाएगा ?', मैंने भी बच्चे की तरह मुस्कराते हुए शर्माते हुए सिर हिलाकर हां कहा, तो उसने अपना पर्स खोला और एक पैकेट मुझे थमा दिया

फिल्मी हलचल

Thursday, June 5, 2008


छोटे आसमां पर बड़े सितारे

शाहरुख खान छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर जाकर बालीवुड का किंग बन गया एवं राजीव खंडेलवाल आपनी अगली फिल्म 'आमिर' से बड़े पर्दे पर कदम रखने जा रहा है, मगर वहीं लगता है कि बड़े पर्दे के सफल सितारे अब छोटे पर्दे पर धाक जमाने की ठान चुके हैं। इस बात का अंदाजा तो शाहरुख खान की छोटे पर्दे पर वापसी से ही लगाया जा सकता था, मगर अब तो सलमान खान एवं ऋतिक रोशन भी छोटे पर्दे पर दस्तक देने जा रहे हैं. इतना ही नहीं पुराने समय के भी हिट स्टार छोटे पर्दे पर जलवे दिखा रहे हैं, जिनमें शत्रुघन सिन्हा एवं विनोद खन्ना प्रमुख है.
 
ਮੇਰੀ ਜ਼ੁਬਾਨ
Sunday, March 22, 2009

ਭਗਤ ਸਿਆਂ ਤੇਰੇ ਵਰਗੇ

ਕਿਸੇ ਸੱਚ ਆਖਿਆ ਹੈ,
ਨੀ ਜੰਮਣੇ ਪੁੱਤ ਭਗਤ ਸਿਆਂ ਤੇਰੇ ਵਰਗੇ

ਸਦਕੇ ਜਾਵਾਂ ਤੇਰੇ ਓਏ ਪੰਜਾਬੀ ਸ਼ੇਰਾ
ਜਿਸਨੇ ਖਤਮ ਕੀਤਾ ਫਰੰਗੀ ਡੇਰਾ .

इनकी अद्यतन पोस्ट 

बुधवार, २० जनवरी २०१०


बसंत पंचमी के बहाने कुछ बातें


चारों ओर कोहरा ही कोहरा...एक कदम दूर खड़े व्यक्ति का चेहरा न पहचाना जाए इतना कोहरा। ठंड बाप रे बाप, रजाई और बंद कमरों में भी शरीर काँपता जाए। फिर भी सुबह के चार बजे हर दिशा से आवाजें आनी शुरू हो जाती..मानो सूर्य निकल आया हो और ठंड व कोहरा डरे हुए कुत्ते की तरह पूंछ टाँगों में लिए हुए भाग गया हो। कुछ ऐसा ही जोश होता

अब देते हैं चिठाकार चर्चा को विराम-आपको ललित शर्मा का राम-राम

11 टिप्पणियाँ:

जी.के. अवधिया ने कहा…

आप के इस ब्लोग के माध्यम से कुलवंत जी का परिचय पाकर बहुत खुशी हुई!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह भई कुलवंत जी के बारे में जानकर अच्छा लगा.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

ललित जी आप काफी मेहनत कर रहे है, प्रसंशनीय

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

prasansneey post.

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' ने कहा…

आपने तो गज़ब कर दिया भाई
बड़ी मेहनत का कारज लिए हो
भाई
आज हम आपके लिए आभार का ट्रक भेज ही देतें हैं
दोनों के लिए जी
बधाई@चिट्ठाकार चर्चा.बहुत अच्छे.काम

बी एस पाबला ने कहा…

कुलवंत जी के बारे में कुछ और जानकारियां पा कर अच्छा लगा.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

प्रिय कुलवंत जी उनके ब्‍लॉग और उनकी पोस्‍टें और इन सबसे बढ़कर उनकी आत्‍मविश्‍वास से लवरेज आवाज। बुलंदियों पर पहुंचो, सच्‍ची खुशी मिलती है इस सबसे मन को। फोन आते ही रहते हैं अक्‍सर। संदेश भी मिलते रहते हैं। ब्‍लॉग कुल का नाम रोशन कर जगत को हैप्‍पी करने में मशगूल।

Kulwant Happy ने कहा…

समझ नहीं आए
कैसे अदा करूँ
शुक्रिया आपका
शब्द कहाँ से लाऊं
जो पूर्वक हो सकें
मेरे प्रति प्रकटाए
आपके स्नेह के।

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

कुलवंत जी के ब्लॉग के बारे में और उनका परिचय जानकर अच्छा लगा । बेहद सुन्दर कार्य कर रहे हैं आप । आभार ।

Udan Tashtari ने कहा…

धन्यवाद आपका कुलवंत भाई से इस तरह परिचित करवाने के लिए...

Mithilesh dubey ने कहा…

कुलवंत भाई का स्वागत है ।